फ्रांस में भाषण, लेखन, प्रकाशन एवं मुद्रण की भी स्वतन्त्रता की घोषणा

फ्रांस में भाषण, लेखन, प्रकाशन एवं मुद्रण की भी स्वतन्त्रता की घोषणा

सभी सम्प्रदाय के लोगों के पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता दी गयी और कैथोलिक धर्म को राज्य-धर्म घोषित किया गया। भाषण, लेखन, प्रकाशन एवं मुद्रण की भी स्वतन्त्रता की घोषणा की गयी। यद्यपि इस आज्ञापत्र में कुछ दोष थे तथापि यह आज्ञापत्र समस्त तत्कालीन विधानों से अधिक उदार और जनसत्तात्मक था और वैधानिक शासन का अच्छा आधार बन सकता था।
नये संविधान के अनुसार जिस निम्न-सदन का गठन किया गया उसमें उग्रपंथियों अथवा प्रगतिशील विचारों वाले व्यक्तियों का बहुमत था । लेकिन उच्च-सदन में बहुमत अनुदार लोगों का था। इसलिए बात-बात में विवाद पैदा होता था। लई ने बाद के काल में सेंसर लागू कर दिया और देश की समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए आक्रामक विदेश नीति लागू की । फ्रांस ने स्पेन में हस्तक्षेप कर वहाँ संविधान की मांग करने वालों को दर दिया।

उदार और जनसत्तात्मक शासन

लुई की मृत्यु (1824 ई.) के बाद चार्ल्स दसवाँ (1824-1830 ई.) गद्दी पर बैठा। वह पुरानी व्यवस्था का कट्टर हिमायती था। वह कहा करता था कि “इंग्लैण्ड के राम का तरह शासन करने की अपेक्षा लकड़हारा बनना बेहतर है ।” उसकी कट्टर नीतिया आलोचना की जाने लगी। उसके युग में पादरियों का अत्यधिक महत्व बढ़ गया | बदल-बदल कर समस्याओं का हल खोजा गया किन्तु कुछ हल नहीं निकला। के समस्त उदारवादी समाचार पत्रों ने एक स्वर से सम्राट की निरंकुशता का किया और चुनौती दी। पेरिस के विद्यार्थियों ने भी एक गणतन्त्रवादी समिति बना 1980 की फ्रांसीसी क्रान्ति के प्रसिद्ध कार्यकर्ता लाफायत के नेतृत्व में गणतन्त्र पना के लिए एक संस्था की स्थापना की गयी । फ्रांस के सभी वर्ग, जो शासन अार्मिक कारता एवं प्रतिक्रियावादी नीति का विरोध करते थे और जो 1814ई, के पत्र पर आधारित वैधानिक राजतन्त्र के समर्थक थे, एक साथ मिलकर चार्ल्स दसवें समान व्यवस्था को बदलने के लिए कटिबद्ध हो गये।

सम्राट की निरंकुशता

जलाई 1830 में राजा ने कतिपय अध्यादेश जारी किये, उन्होंने आग में घी का काम किया। यह घोषणा हुई कि बिना सरकारी आज्ञा के कोई नया अखबार प्रकाशित नहीं होगा हाल ही में हुए चुनावों को रद्द कर दिया गया, चुनाव के कानून बदल दिये गये, चुनाव की नई तिथि घोषित की गयी। अध्यादेश के पारित होते ही विरोध के स्वर मुखरित होने लगे । पेरिस में उपस्थित पत्रकारों और निम्न सदन के सदस्यों ने विरोध पत्र तैयार किया । मजदूरों ने आन्दोलन शुरू कर दिया । विशेष रूप से प्रेस के मजदूरों ने विद्रोह कर दिया । कुछ ही दिनों में पहली क्रान्ति के दिन लौट आये। प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ लाफ़ायत एवं तेलीरां के नेतृत्व में जनता ने सेना का खूब मुकाबला किया, राजा की बहुत सी सेना स्वयं विद्रोही हो गयी और तीन दिन के संघर्ष के बाद राजा की शेष सेना परास्त हो गयी। राजा ने उन अध्यादेशों को वापस लेने का प्रयत्न किया परन्तु अब उसके लिए समय नहीं रहा था ।

जुलाई-क्रान्ति

अन्त में वह पेरिस छोड़कर भाग गया। इस ‘जुलाई-क्रान्ति’ ने दैवी अधिकार पर आश्रित एकतन्त्र का तो अन्त कर दिया परन्तु उसके स्थान पर क्या व्यवस्था स्थापित की जाय, इस प्रश्न पर तीव्र मतभेद उत्पन्न हा गया । कुछ क्रान्तिकारी तत्काल गणतन्त्र की स्थापना करना चाहते थे। उनमें छात्र आर मजदूर भी थे जिनका नेता केवेन्याक था । परन्तु वे लोग अल्पमत में थे। किन्तु अवकाश नागरिक गणतन्त्र की स्थापना के विरुद्ध थे क्योंकि उनके मस्तिष्क में अभी एक पुराने गणतन्त्र की स्मृतियाँ ताजी थीं। दूसरे गणतन्त्र की स्थापना से यूरोपीय राजतन्त्रा के हस्तक्षेप की आशंका थी । दीयर के नेतृत्व में मध्यवर्ग एवं पूंजीपति वर्ग राजतन्त्र का समर्थक था। इस दल को फ्रांस की उस समस्त बहुसख्यक जनता सयन प्राप्त था जो स्वतन्त्रता के साथ व्यवस्था चाहती थी। बूबों वंश के निकट के का शासक बनाया गया। 9 अगस्त, 1830 को ‘फ्रांस के राजा’ नहीं वरन् ‘फ्रेंच राजा’ की तरह लई फिलिप के राज्याभिषेक की घोषणा हुई। देवी अधिकार करन वाले राजा के स्थान पर जनता द्वारा स्वीकृत राजा सिहासनारूढ़ हुआ, सफद झण्डे के स्थान पर फिर फ्रांस का राष्ट्रीय तिरंगा झण्डा फहराने लगा रकुश एकतन्त्र की जगह जनता की सम्प्रभुता का सिद्धान्त प्राताष्ठत हा गया। यह उदारवाद की विजय थी।

नागरिक गणतन्त्र की स्थापना

कात्ति यदि फ्रांस तक सीमित रहती तब भी इसका महत्व था और यह उसके के इतिहास की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी। लेकिन इस समय तक यरोप प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ एकजुट हो रही थी तो क्रान्तिकारी लोगों में भी सहयोग बदाम रन्तोष और परिवर्तन की उत्कट अभिलाषा यूरोप के अधिकांश देशों में व्याप्त की इसलिए प्रयास की घटनाओं ने यूरोप के स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम सहित अनेक देशों पर सुई फिलिप (1830-48 ई.) ने फ्रांस के सिंहासन को स्वीकार करते समय उदारता का परिचय दिया और नागरिक राजा’ की उपाधि धारण की । यह इस बात का परिचायक था कि वह स्वयं को राजवंश से सम्बन्धित न मानकर सामान्य नागरिक ही मानता था। किन्तु इस सब के पीछे उसकी महत्वाकांक्षा थी। वह एक ऐसे मार्ग का अवलम्बन करना चाहता था जिससे उसे किसी विरोध का सामना न करना पड़े। उसने 1814 ई. के सावधान को कुछ परिवर्तनों के साथ स्वीकार किया। मतदाताओं की योग्यता 200 फ्रेंक प्रत्यक्ष कर रखो गयी। इससे मतदाताओं की संख्या दुगुनी हो गयी किन्तु साधारण जनता को कोई लाभ नहीं मिला। शासन की बागडोर कुछ प्रवर-व्यक्तियों के हाथ में बनी रही. फिर उसकी प्रवरता चाहे सम्पत्ति पर आधारित हो अथवा कुल या बुद्धि पर।

उदारवादियों, निरंकुशवादियों को संतुष्ट करने की कोशिश

लुई फिलिप विभिन्न वर्गों-गणतन्त्रवादियों, समाजवादियों, उदारवादियों, निरंकुशवादियों को संतुष्ट करने की कोशिश में किसी को संतुष्ट न कर सका । लुई फिलिए की नीतियों से जब अमिकों, कृषकों, और साधारण व्यापारियों को कोई लाभ नहीं पहुँचा तो दे आन्दोलन पर उतर आये | श्रमिकों ने अपने संघ बना लिये। प्रभावशाली समाजवादी नेता लुई ब्लां ने फ्रांस की तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया । दुर्भाग्यवश, लुई फिलिप ने किसी समस्या के प्रति गम्भीर रवैया नहीं अपनाया। ऐसे समय में लुई फिलिप ने जनता के भाषण और लेखन तथा गणतन्त्रवादी विचारधारा के समर्थक समाचार पत्रों पर प्रतिबन्ध लगाया. राज्य के कार्यों की आलोचना करने वालों को दण्ड दिया गया और जब मताधिकार को विस्तृत करने की मांग के लिए उदारवादी नेताओं ने प्रीति-भोजों का आयोजन किया तो उसने प्रीति-भोजों पर प्रतिब्य लगा दिया।

लुई फिलिप की प्रतिक्रियावादी नीति के विरोध में आन्दोलन का स्वरूप बदलने लगा क्रान्तिकारी अधिक से अधिक जन समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। 22 जनवरी, 1843 को अमेरिका के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी नेता जॉर्ज वाशिंगटन के जन्म दिवस पर क्रान्तिकारिया ने समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से सारे देश में सुधार प्रीति-भोजों का आयोजन किया।

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