औद्योगिक प्रगति की शुरुआत मुख्यतः वस्त्र उद्योग

औद्योगिक प्रगति की शुरुआत मुख्यतः वस्त्र उद्योग

एक बात और, इस युग में हुए परिवर्तनों से भोजन की पौष्टकता मढ़ी । जड़ों वाली सब्जियों के उगाये जाने से पशुओं को पूरे साल का चारा देना सन्था हो गया और फलतः बारह महीने ही ताजा मांस मिलने लगा । यह स्मरणीय है कि पहले चारे की कमी के कारण सर्दियों के आरम्भ में पशुओं के मारने का प्रचलन था। बाद आदि के प्रयोग से सब्जियों का उत्पादन भी बढ़ा । इस सबका जनता के स्वास्थ्य पर अनुकूल असर पड़ा । मजदूरी की माँग, जल्दी विवाह, पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य मतपति, चिकित्सा के क्षेत्र में हुई प्रगति, बाल-मृत्यु दर में कमी, प्लेग का ह्रास, दुर्भिक्ष की समाप्ति आदि कारणों से जनसंख्या में वृद्धि हुई । जनसंख्या वृद्धि से वस्तुओं की मांग बड़ी जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ाने को विशेष प्रोत्साहन मिला। परम प्रयोगों में यन्त्रों का प्रयोग औद्योगिक प्रगति की शुरुआत मुख्यतः वस्त्र उद्योग से हुई।

जनसंख्या में वृद्धि

अठारहवीं शताब्दी के मा तक यूरोप में सूत कातने के दो ही साधन थे-तकली और चरखा । किंतु पुरान दलों की बढ़ती मांग की पूर्ति कर पाने में समर्थ नहीं थे। साथ ही 1750 ई. तक एक नये रेशे कपास का इस्तेमाल करने लगे। इससे पहले सूती कपड़े इंग्लैण्ड भारत से ही आयात किये जाते थे। किंतु इंग्लैण्ड ने भारत के वस्त्र उद्योग को हतोत्साहित ले के लिए अपने ही देश के उद्योग को बढ़ावा दिया और भारतीय आयात पर कई कार के प्रतिबध थोप दिए। इसमें सन्देह नहीं है कि सूती वस्त्र उद्योग में मानवीय श्रम स्थान पर मशाला को उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने से अनन्त सम्भावनाएँ तथा अवसरहान आए। अब हाथ से किए जाने वाले काम का चलन काफी घट गया ।
पिछले कई दशकों से हो रहे तकनीकी परिवर्तनों से ही बुनाई और कताई के उपकरणों को लगाने का विचार मूर्त रूप धारण कर सका।

फ्लाइंग-शटल का आविष्कार

1736ई में जोन के ने फ्लाइंग-शटल का आविष्कार किया जिससे कपड़े बुनने के कार्य में तेजी आयी। अब एक जुलाहा उतना सूत प्रयोग में लाने लगा जितना कि दस कि एक दिन में कात सकते हैं। 1764 ई. में जेम्स हारग्रीव्स ने ‘स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किया। इससे एक ही साथ सूत के आठ धागे काते जा सकते थे। 1769 ई. रिचर्ड आर्कराइट ने स्पिनिंग जेनी में सुधार करके जल-शक्ति से चलने वाला ‘वाटर कर नामक सूत कातने का यन्त्र बनाया । यह सबसे पहली सूत कातने की मशीन थी जो हाथ से चलकर जल-शक्ति द्वारा चलती थी। कुछ विद्वानों के अनुसार औद्योगिक कार की शुरुआत वस्तुतः 1769 ई. से हुई । इतिहासकार फिशर के अनुसार आर्कराइट के आविष्कार ने महान् सूती वस्त्र उद्योग की नींव डाली और कारखाना व्यवस्था को जन्म दिया। 1779 ई. में सेमुअल काम्पटन ने स्पिनिंग जेनी और वाटर फ्रेम दोनों को मिलाकर एक मशीन बनायी जिसे ‘म्यूल (खच्चर) कहा जाता है। इससे बारीक सूत काता जा
सकता था और इससे सूत कातने की गति में भी वृद्धि हुई । इन आविष्कारों के परिणामस्वरूप अशा धागा काफी मात्रा में उपलब्ध हो गया । अतः उसी अनुपात में बुनाई के क्षेत्र में भी सोनों का प्रयोग आवश्यक हो गया। 1785 ई. में एडमण्ड कार्टराइट ने शक्ति चालित करपे का आविष्कार किया। इसे जल-शक्ति और वाष्प शक्ति दोनों से चलाया जा सकता या।

इस मशीन से बढ़िया किस्म का कपड़ा इतना सस्ता हो गया कि उतना इससे पहले कमी नहीं हुआ था। कुछ वर्षों के बाद लगभग सभी कारखानों में इस मशीन को प्रयुक्त किया जाने लगा।
अब कातने की मशीन के लिए रुई की कमी पड़ने लगी क्योंकि कपास से बिनौला अलग करने की प्रक्रिया उस समय बहुत धीमी थी । एक अमेरिकी शिक्षक ऐली व्हिटने ने ई.में कपास ओटाने की मशीन का आविष्कार किया जिसे ‘कॉटन जिन’ कहा या इस आविष्कार ने कपास उद्योग में क्रान्ति उत्पन्न कर दी। इस मशीन द्वारा कपास बनौलों को इतनी जल्दी अलग किया जा सकता था कि एक मशीन हाथ से काम न बाले 50 मजदूरों के बराबर काम कर सकती थी। उन्नीसवीं सदी में भी आविष्कारों यह अखला चलती रही। 1825 ई. में रिचर्ड राबर्ट्स ने पहली स्वचालित बुनाई मशीन 11846.के बाद बढ़िया सिले हुए वस्त्र बड़े पैमाने पर तैयार होने लगे क्योंकि अमेरिकी एलियास होव ने सिलाई मशीन का आविष्कार कर लिया था।

 नई प्रकार की शक्ति : वाष्प इंजन

नये-नये यन्त्रों का आविष्कार होता जा रहा था । उनको चलाने के लिए नये स्रोत की आवश्यकता बढ़ती जा रही थी। अभी तक जल-शक्ति एवं पवन प्रयोग किया जाता था परन्तु इसकी सीमाएँ थीं। जल-शक्ति का उपयोग करने का कारखानों का निर्माण तेज बहाने वाली पानी की धारा के समीप करना पड़ता था ऐसी जल धाराएँ पर्याप्त न थीं तथा वे प्रायः उन स्थानों से बहुत दूर थीं जहाँ म मिल सकते थे, कच्चा माल सुलभ था और बाजार थे। इसलिए अनेक लोगों ने वाष्प-शकि का उपयोग करने के उपाय खोज निकाले । सर्वप्रथम 1712 ई. में टामस न्यूकोमेन नामक एक अंग्रेज ने खानों से पानी बाहर निकालने के लिए वाष्प इंजन का आविष्कार किया परन्तु इस इंजन में ईधन का खर्चा अधिक था तथा यह इतना भारी था कि सब स्थानों पर इसका प्रयोग सम्भव न था । जेम्स वाट ने 1769 में न्यूकोमेन के इंजन के दोषों को दूर करके एक नया वाष्प इंजन बनाया जो कम खर्चीला और अधिक उपादेय सिद्ध हुआ। 1775 ई. में इंजन बनाने का कारखाना, जेम्स वाट ने एक उद्योगपति की साझेदारी में स्थापित किया। लगभग सभी सूती-वस्त्र उत्पादक कारखानों में जेम्स वाट के इंजन को लगाया जाने लगा।

लौह उद्योग में नई तकनीक का प्रयोग

नई-नई मशीनें बनाने के लिए और अधिक लौहे की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी । लेकिन कच्चे लोहे को पिघलाकर उसके मैल को साफ करने का ढंग पुराना, श्रमसाध्य एवं महंगा था । लोहे को पिघलाने के लिए इंग्लैण्ड में लकड़ी का कोयला काम में लाया जाता था किंतु कुछ वर्षों बाद लकड़ी के कोयले में तेजी से कमी आने लगी। अतः ईंधन के अन्य साधनों की खोज की जाने लगी। 1750 ई. के आस-पास यह पता लगा कि पत्थर के कोयले से बना कोक प्रयुक्त किया जा सकता है। कोक की तेज ऊमा से लौह अयस्क को पिघलाने एवं साफ करने का काम सुगम हो गया । अब कोक की माँग भी बढ़ने लगी । फलतः पत्थर के कोयले के खनन में भी प्रगति हुई । धीरे-धीरे नई किस्म की भट्टियाँ तैयार होने लगी और साफ व मजबूत लोहा भारी मात्रा में बनने लगा। 1784 ई. में हेनरी कोर्ट ने एक ऐसी विधि का आविष्कार किया जिसके द्वारा अधिक शुद्ध और अच्छा लोहा बनाना सम्भव हो गया।

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