नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता के कारण

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता के कारण

इंग्लैण्ड की घोषणा के प्रत्युत्तर में नेपोलियन ने 17 दिसम्बर, 1807 में मिलान से एक और आज्ञा-पत्र जारी किया। मिलान आज्ञाप्तियाँ बर्लिन आज्ञाप्तियों से ज्यादा कठोर थीं । मिलान आज्ञाओं के अनुसार कोई भी जहाज चाहे वह किसी भी दिशा का हा लिया जायेगा। यदि वह अंग्रेजी बन्दरगाह से होकर आया हो तो उसे पकड़ कर उसका माल जब्त कर यद्यपि महाद्वीपीय व्यवस्था नेपोलियन की अद्भुत सूझबूझ थी। इसका उद्देश्य इंग्लैण्ड *व्यापारिक प्रभुत्व को समाप्त करके फ्रॉस को यूरोपीय व्यापारिक केन्द्र बनाना था। अयोजना को लागू करने के लिए उसने जो कठोर कदम उठाये उनके परिणामस्वरूप वह घातक आक्रामक युद्धों में उलझता चला गया। उसकी यह नीति उसके व यूरोप के लिए आत्मघाती सिद्ध हुई । इंग्लैण्ड की सशक्त सेना ने यूरोपीय बन्दरगाहों पर इतनी जबरदस्त नाकेबन्दी की कि स्वयं यूरोप का उसके उपनिवेशों से सम्बन्ध विच्छेद हो गया।

व्यापारिक प्रभुत्व को समाप्त

यरोप में माल आना-जाना बन्द हो गया । नेपोलियन का विचार था कि फ्रेंच उद्योगों से यूरोप को माल मिल जायेगा किन्तु फ्राँस के कारखाने तुरन्त इतने अधिक विकसित न हो सकते थे और न ही सभी प्रकार की वस्तुओं का उत्पादन फ्रेंच कारखानों में ही सम्भव था। इसके अतिरिक्त फ्रॉस का उत्पादन भी उच्चकोटि का न था तथा मूल्य भी अधिक थे। महाद्वीपीय व्यवस्था से यूरोपियन व्यापारियों का व्यापार चौपट होने लगा एवं यूरोपीय जनता भारी संकट में पड़ गई । वस्तुओं के अभाव में जन सामान्य का जीवन असह्य हो गया तथा तस्कर व्यापार में वृद्धि हुई । तटस्थ राष्ट्रों के माध्यम से चोरी छिपे माल पहुँचने लगा किन्तु माल के मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि हो गई।

यूरोपियन व्यापारियों का व्यापार चौपट

यूरोपियन राष्ट्रों ने महाद्वीपीय व्यवस्था को बिल्कुल पसंद नहीं किया । फ्राँस के अधीनस्थ राज्यों को बाध्य होकर इसमें सहयोग देना पड़ा किन्तु इसके पालन का अर्थ उनके लिए महाबलिदान और भारी परेशानी थी। यूरोप के अधिकाँश राष्ट्र उसकी व्यवस्था को अपनाने के लिए बाध्य हुए थे । स्वीडन, हॉलैण्ड व पोप के राज्य ने इस नीति का विरोध किया । पुर्तगाल ने इंग्लैण्ड से अपने पुराने मैत्री सम्बन्ध तोड़ने से इन्कार कर दिया। नेपोलियन ने स्पेन के साथ मिलकर पुर्तगाल पर आक्रमण किया व उसे जीत कर अपने राज्य में मिला लिया। इस अवसर पर नेपोलियन ने कहा था “ब्रगांजा वंश का पतन इस बात का एक और सबूत है कि जो कोई भी अंग्रेजों का दामन पकड़ता है उसका नाश अनिवार्य है ।” इस प्रकार अपनी ही महाद्वीपीय व्यवस्था के कारण नेपोलियन ने अपने सभी मित्रों को असंतुष्ट कर दिया । हॉलैण्ड में नियुक्त उसके भाई लुई बोनापार्ट ने नेपोलियन की मनोवृति के विषय में कहा था-“इंग्लैण्ड से छेड़े गये संघर्ष के विरुद्ध वह कोई आक्षेप या शिकायत नहीं सुनता था और राजनीति एवं अर्थशास्त्र के नियमों की पूर्ण उपक्षा करता हुआ अपनी नीति का परिपालन करता जा रहा था ।” वस्तुतः इंग्लैण्ड को प्वस करने की नेपोलियन की यह नीति आत्मघाती थी तथा व्यावहारिक बुद्धि और राजनीतिक उद्देश्यों की सीमा के बाहर थी।

पुर्तगाल पर आक्रमण

इसमें सन्देह नहीं कि महाद्वीपीय व्यवस्था नेपोलियन के मस्तिष्क की सूझ थी और पदवह सफल हो गई होती तो विश्व इतिहास का रुख ही परिवतित हो जाता। इसका ५५य इग्लैण्ड के व्यापारिक प्रभुत्व को यूरोप से खत्म कर फ्रांस को आर्थिक गतिविधि बनाना था लेकिन नेपोलियन के दुर्भाग्य से यह व्यवस्था सफल न हो सकी और राष्ट्रीय व्यापार तथा सामुद्रिक मार्गों पर ब्रिटेन का प्रभाव बना रहा।

महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता के कारण

जिस समय नेपोलियन ने इस व्यवस्था को लागू किया, यह ठीक है कि यूरोप उसके प्रभाव क्षेत्र में था किन्तु वह भूल गया था कि ब्रिटेन के अपने अनेक उपनिवेश हैं जिससे उसके माल का यूरोप में आगमन पर प्रतिबन्ध कोई महत्व नहीं रखता था । ब्रिटेन अपने उपनिवेशों से कच्चा माल मंगाता और तैयार माल बेचता था । अतः जब तक उसके दुनिया भर में फैले उपनिवेशों पर प्रतिबन्ध न लगा दिया जाता तब तक इस व्यवस्था के सफल होने की आशा करना व्यर्थ था । जहाजी बेड़े के अभाव में हजारों मील लम्बे समुद्रतट की रक्षा करना फ्रांस के लिए असम्भव था । फ्रांस के पास इतना अधिक शक्तिशाली जहाजी बेड़ा नहीं था कि वह खुले समुद्र में जहाजों को पकड़ सके । बिना वृहत् सेना के विस्तृत सीमा पर माल को यूरोप में आने से रोकना सम्भव नहीं था।

यह एक असम्भव योजना थी। प्रत्येक देश से यह आशा करना व्यर्थ था कि भारी कष्ट उठाते हुए वह इस योजना का पालन करता रहेगा । नेपोलियन के राज्यों ने इस योजना को विवशतावश स्वीकार किया था और अवसर मिलते ही उन्होंने इस योजना का परित्याग कर दिया। सारे यूरोप में इंग्लैण्ड से आने वाले माल के लिए चोर बाजारी व तस्करी होने लगी । नेपोलियन ने इस जना को स्वीकार कराने के लिए अनेक देशों से युद्ध किए, फलतः वे सभी देश उसकेटर शत्रु हो गए।

इंग्लैण्ड में अन्न का अभाव था | परन्तु नेपोलियन उसको बराबर भारी मूल्य पर, उसका धन कम करने के लिए, अन्न भेजता रहा। यदि इंग्लैण्ड में अन्न न पहुँचता तो राष्ट्र भूखों मरने लगता और सम्भवतः विवश होकर सन्धि के लिए तैयार हो जाता।

फ्रांस के उद्योगों का विकास

नेपोलियन का विचार था कि आर्थिक प्रतिबन्ध से फ्रांस के उद्योगों का विकास होगा और यूरोप की आवश्यकता की पूर्ति हो जायेगी, किन्तु अल्प समय में उद्योगों का विकास होना भी सम्भव नहीं था। इसके अलावा फ्रांस का जो भी माल यूरोप के बाजारों में आता वह निम्न कोटि का तथा महंगा होता था । नेपोलियन ने फ्रांस में कुछ निश्चित प्रकार के मालों को आर्थिक लाभ के लिए चुंगी लगाकर आने की आज्ञा दे दी थी. लेकिन रूस ने जब इसकी आज्ञा माँगी तब वह नाराज हो गया । इस नीति से यूरोप के मध्य देश बहुत क्रुद्ध हुए।

प्रष्ट अधिकारियों के कारण भी यूरोप में अतुल मात्रा में अवैध रूप से माल आता रहा जिससे इसकी असफलता और भी निश्चित हो गई। नेपोलियन की यह योजना अव्यावहारिक थी। यूरोप में उसने कई मांगों को पूरा करने की कोशिश की परन्तु चमड़े के जूते, गर्मकोट आदि के लिए उसे इंग्लैण्ड पर ही निर्मर रहना पड़ा। इसी अव्यावहारिक योजना को सफल बनाने में यह यूरोपीय युद्धों में इतना फस गया कि उसका वास्तविक लक्ष्य ही छूट गया।

इस व्यवस्था के परिणामों से ब्रिटेन को प्रभावित करने के लिए अधिक समय की आवश्यकता थी। अल्प समय में इंग्लैण्ड के व्यापार पर इसका कोई प्रभाव नहीं हो सकता था, जब तक कि इंग्लैण्ड के सुरक्षित स्रोत समाप्त न हो जाते । नेपोलियन तानाशाह प्रकार के प्रतिबन्ध र किसी भी नियम को अपने देश में लागू कर सकता था किन्तु दूसरे देशों पर इस प्रतिबन्ध अधिक समय तक लगाये रखना सम्भव नहीं था।

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