यूरोप में समाजवादी तथा श्रम आन्दोलन (Socialist and labour Movements in Europe)

यूरोप में समाजवादी तथा श्रम आन्दोलन (Socialist and labour Movements in Europe)

यूरोप के कुछ देशों में अन्वेषणों और खोजों के फलस्वरूप उत्पादन की प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए तथा औद्योगिक क्रान्ति की शुरूआत हुई | ज्यों-ज्यों उद्योगीकरण में वृद्धि हुई, त्यों-त्यों आर्थिक विकास की गति तीव्र होती गई । उत्पादन एवं व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई । इस उद्योगीकरण में प्रमुख भागीदारी मध्यम वर्ग की थी। मध्य वर्ग के लोगों के पास बुद्धि थी, परिश्रमशीलता थी, जोखिम उठाने की शक्ति थी तथा पूँजी थी। फिर भी समाज में उन्हें प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं थी क्योंकि परम्परागत सामंतवर्ग उन्हें समानता का स्तर प्रदान करने के लिए राजी नहीं था । अतः समानता एवं स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए मध्यवर्ग के नेतृत्व में लोकतन्त्रीय आन्दोलन का प्रादुर्भाव हुआ । प्रारम्भ में श्रमिकों ने इस आन्दोलन में मध्य वर्ग का साथ दिया क्योंकि उन्हें आशा थी कि उन्हें भी इस आन्दोलन से लाभ होगा। परन्तु जब उन्होंने देखा कि प्रगति का लाभ केवल मध्य वर्ग को ही मिल रहा है, उन्हें नहीं; तब वे निराश होकर समाजवादी आन्दोलन की ओर प्रवृत्त हुए।

औद्योगिक क्रान्ति की शुरूआत

समाजवाद के बीज अठारहवीं शताब्दी के प्रबोधन आन्दोलन के दार्शनिकों के लेखों में उपलब्ध होते हैं। प्रबोधन आन्दोलन से उत्पन्न उदारवाद एवं समाजवाद में कुछ बातें समान हैं जैसे-प्रगति में आस्था तथा अलौकिकता का विरोध | दोनों ही अठारहवीं शताब्दी के ईसाई धर्म विरोधी तर्कवाद से संबद्ध थे। परन्तु दोनों में राज्य तथा व्यक्ति के अधिकारों के बारे में मतभेद था । उदारवादी, जो प्रायः मध्यवर्ग के सम्पन्न व्यक्ति होते थे, राज्य के अधिकारों को मर्यादित करने तथा आर्थिक हितों और प्रक्रियाओं को स्वच्छंद रूप से विकसित होने देने के हामी थे। परन्तु समाजवादी वर्ग को जब यह अहसास हो गया कि उदारवादी स्वतन्त्रता का अर्थ मालिकों द्वारा श्रमिकों के शोषण की स्वतन्त्रता से लेते हैं व राज्य के अधिकारों की वृद्धि तथा अंततोगत्वा स्वयं अमिकों द्वारा राज्य पर अपना अधिकार स्थापित करने की माँग करने लगे।

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में शोषित वर्ग

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में शोषित वर्ग पर उद्योगवाद के प्रसार का जबर्दस्त असर पादने लगा और वह आर्थिक विवशता के कारण जमीन छोड़-छोड़ कर काम की तलाश में कारखानों में जाने के लिए मजबूर हुआ | कारखानों को खोलने में सबसे आगे बढ़ा हुआ था । अतः औद्योगिक मजदूरों का वर्ग भी सर्वप्रथम इंग्लैण्ड बढ़ा | कारखानों के भीतर की हालत दिल दहलाने वाली थी और मजदूरों के घर झोंपड़ों की उनसे भी बदतर । उनकी मुसीबतें भी बहुत थीं। छोटे-छोटे बच्चों और रियर को इतने घण्टे काम करना पड़ता था कि आज उस पर यकीन नहीं होता। फिर कानून द्वारा मजदूरों की हालत सुधारने की सब कोशिशों का मालिकों ने डटकर विरोध किया । परन्तु इस विरोध का भी विरोध होना था। इस विरोध को मुखरित किया था फ्रांस की राज्यक्रान्ति के उस विचार ने, जिसके अनुसार राज्य में किसी एक व्यक्ति या श्रेणी का प्रभुत्व न होकर साधारण जनता का शासन होना चाहिए। निरंकुशता के प्रति अस्वीकारता की इस भावना का विस्तार कालान्तर में राजनीतिक क्षेत्र से बढ़कर आर्थिक क्षेत्र में हुआ । अब यह स्वाभाविक था कि पूँजीपतियों के एकाधिपत्य के विरुद्ध भी आवाज बुलन्द हो और लोग एक नये सामाजिक संगठन को मूर्त रूप दें। शनैः शनैः इस विचार ने अपनी जड़ें पकड़ी कि आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में भी समानता का सिद्धान्त लाग होना चाहिए । यही कारण है कि अठारहवीं सदी के अन्त में समाजवादी विचारों को बहुत महत्व मिला।

मानवतावादी भावना से ओत-प्रोत

एक ओर उद्योगीकरण का प्रभाव बढ़ रहा था, तो दूसरी ओर मानवतावादी भावना से ओत-प्रोत कुछ समृद्ध लोगों ने यह दलील देना प्रारम्भ किया कि समृद्धि का वितरण ठीक हो जिससे कि श्रमिक वर्ग भी उसका भागीदार हो तथा धनवानों और निर्धनों के बीच की खाई कम हो । किन्तु इस लक्ष्य की प्राप्ति के सम्भावित साधनों के बारे में मानवतावादी विचारक एक मत नहीं थे। कुछ का विचार था कि इसके लिए उत्पादन के साधनों पर राज्य का एकमात्र अधिकार होना चाहिए । अन्य लोगों के अनुसार स्वशासित एवं स्व-वित्त पोषित छोटे-छोटे कम्यूनों के निर्माण द्वारा ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता था । मानवतावादी विचारकों के कुछ भी मत रहे हों किंतु अब सर्वहारा वर्ग हाथ पर हाथ रखे बैठा नहीं रह सकता था। मानवतावादी विचारकों के कुछ भी मत रहे हों। किंतु अब सर्वहारा वर्ग हाथ पर हाथ रखे बैठा नहीं रह सकता था।

रक्षा एवं हालात में सुधार

मजदूर गरीबी और ज्यादा कार्य के बोझ से दबा जा रहा था। इंग्लैण्ड सहित अन्य देशों में सर्वहारा की स्थिति दयनीय ही थी। नेपोलियन के युद्धों से इंग्लैण्ड कमजोर होता जा रहा था और आर्थिक मंदी फैल गयी थी, जिसकी मार सबसे ज्यादा मजदूरों पर ही पड़ी । मजबूर होकर मजदूर लोग अपनी रक्षा एवं हालात में सुधार के लिए संघर्ष हेतु समितियाँ बनाना चाहते थे। परन्तु उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया। इंग्लैण्ड का शासक वर्ग फ्रांस की राज्य क्रान्ति से इतना डर गया था कि उन्होंने सम्मिलित कानून’ कहलाने वाले ऐसे कानून बना दिये कि बेचारे मजदूर अपने सुख-दुःख की चर्चा करने के लिए इकट्ठे भी न हो सकें । परन्तु ये कानून उन्हें भड़कने से न रोक सके। उन्होंने गुप्त समितिया बनायीं, सब बातें गुप्त रखने की आपस में कसमें खायीं और सुनसान जगहा में आधी रात गये समायें करने लगे। किसी साथी की गद्दारी पर षड्यन्त्र के मुकदमें चलत भयंकर सजाय दी जाती। कभी-कभी वे गुस्से में आकर मशीनों को तोड़-फोड़ देते. सालों में आग लगा देते और कुछ मालिकों की हत्या भी कर डालते ।

मजदूर यूनियन

अन्त में, 1825 में मजदूर संगठनों पर से कुछ पाबन्दियाँ हटा ली गयीं और मजदूर यूनियनें बनने सायनियनें अच्छा वेतन पाने वाले कुशल मजदूरों ने बनायीं किन्तु अकुशल मजदूर
अरसे तक बिखरे ही रहे। मजदूर आन्दोलन ने मिलकर शर्ते तय करने के उपाय से मजदूरों के हाथ में कारगर हथियार तो सिर्फ हड़ताल करने का अधिकार था, पनि काम बन्द कर देना और कारखाने का काम ठप्प कर देना । बेशक, यह बड़ा हथियार भीमगर उनके मालिकों के हाथ में इससे भी बड़ा हथियार यह था कि वे मजदूरों को खों मारकर उनके घुटने टिकवा सकते थे। इस तरह मजदूरों की लड़ाई जारी रही, जिसमें उन्हें बहुत कुर्बानियाँ देनी पड़ी किंतु लाभ धीर-धीरे हुआ | पार्लियामेंट पर उनका प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं था, क्योंकि उन्हें वोट देने का भी अधिकार नहीं था । इंग्लैण्ड में 1832 ई के ‘सुधार-बिल’ में उच्च-मध्यवर्ग को ही वोट देने का अधिकार मिला था, मजदूरों को नहीं । यहाँ तक कि निम्न मध्यवर्ग को भी वोट देने का अधिकार नहीं था।

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